आदर्शों पर चलना; भगवान राम का मार्ग

पौराणिक विषयों का लेखक होने का एक फ़ायदा यह भी है कि आपको साहित्यिक उत्सवों में आमंत्रित किया जाता है। ऐसी ही एक सभा में, मेरा सामना धार्मिक दर्शनों और व्यक्तित्वों पर पूछे गए बहुत कठिन सवालों से हुआ। जब किसी कहानी की आलोचना करने की वजह होती है, तो मैं बेहिचक ऐसा करता हूं। और जब किसी ग़लतफ़हमी को दूर करने का कोई मौक़ा पेश आता है, तो भी मैं समान भाव से प्रयास करता हूं। एक सवाल–जवाब ने मुझे दुखी कर दिया। किसी दार्शनिक विचार को समझाते हुए मैंने भगवान राम का उदाहरण दिया।

आयोजन के बाद एक महिला भिन्न ने मुझसे बात की। मैं उन्हें, और साथ ही उनके धार्मिक और उदारवादी विचारों को भी जानता हूं। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने भगवान राम के लिए ‘भगवान’ जैसा श्रद्धासूचक शब्द क्यों लगाया। मैंने कहा मैं उनका सम्मान करता हूं। मैं उनकी पूजा करता हूं। उनके प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करके मुझे संतुष्टि मिलती है। उन्होंने कहा कि वे मुझे एक ऐसे उदारवादी के रूप में देखती हैं जो स्त्रियों का सम्मान करता है! फिर मैं कैसे भगवान राम का सम्मान कर सकता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी के साथ इतना अन्याय किया? वे भगवान राम के प्रति बहुत कठोर राय प्रकट करती रहीं।

दुर्भाग्य से, आजकल उदारवादी दायरे में भगवान राम की आलोचना करने का कुछ फ़ैशन सा हो गया है। हिंदू धर्म में हमें प्रश्न करने के लिए प्रेरित किया जाता है! भगवद्गीता में भगवान कृष्ण स्पष्ट रूप से इसे हमारे ऊपर लागू करते हैं। हमें सलाह दी जाती है कि हरेक विषय पर हम अपनी राय बनाएं, धर्मशास्त्रों और ईश्वर तक पर। लेकिन अपनी राय को दृढ़ बनाने से पहले हमें गहराई से सोचने और विषय के सभी पक्षों को परखने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।

भगवान राम के संदर्भ में ऐसा करने के अपने प्रयासों में हम नाकाम हो रहे हो सकते हैं। भगवान राम को ‘आदर्श पुरुष’ कहा जाता है, जोकि संस्कृत में उनके लिए प्रयुक्त विशेषण ‘मर्यादा पुरुषोतम’ का अपूर्ण भाषांतरण है। ‘आदर्श पुरुष’ केवल ‘पुरुषोत्तम’ का समानार्थी हो सकता है। मगर दूसरे शब्द ‘मर्यादा’ का क्या? इसका मतलब है नियमों या परंपराओं का सम्मान।

तो अगर हम ‘मर्यादा’ और ‘पुराषोतम’ को साथ लाते हैं, तो इसका सही समानार्थी ‘नियमों का आदर्श अनुयायी’ होगा। अब हिंदू धर्मग्रंथों में रामायण और महाभारत की भूमिका पर विचार करते हैं। इन दोनों महाकाव्यों को श्रुतियों में शामिल नहीं किया जाता है जो कि दिव्य रूप से प्रकट हुए दर्शन शास्त्र होते हैं जैसे वेद और उपनिषद। रामायण और महाभारत को इतिहास कहा जाता है।

ये ऐसी कहानियां हैं जो हमें बताती हैं ‘इस प्रकार ऐसा हुआ’! ये मूल आदर्श और विचार प्रकट करती हैं जिनसे हम सीख सकते हैं और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। और भगवान राम ‘नियमों के आदर्श अनुयायी’ के मूल आदर्श हैं। तो हम इस ‘नियमों के आदर्श अनुयायी’ के जीवन से क्या सीख पाते हैं? हम सीखते हैं कि ऐसे मूल आदर्श रूप नायक अपने संपूर्ण समाज के लिए परिवर्तनकारी हैं। वे अपनी प्रजा की समृद्धि और उनके सुखी, संतुष्ट जीवन के लिए स्थितियों का निर्माण करते हैं। इसमें कोई हैरानी नहीं है कि इस ‘नियमों के आदर्श अनुयायी’ के राज्य को आज भी सुप्रशासन के सुनहरे मापदंड की तरह माना जाता है: राम राज्य। दुर्भाग्य से, यद्यपि इस तरह के मूल आदर्श रूप नायक समाज के लिए अच्छे होते हैं, मगर अपने निजी जीवन में वे संघर्ष करते हैं। अक्सर ही, ‘नियमों के आदर्श अनुयायी’ का परिवार एक चुनौतीपूर्ण जीवन का सामना करता है!

स्वयं ‘नियमों का आदर्श अनुयायी’ दुखी जीवन जीता है। बेशक, हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि देवी सीता को भगवान राम द्वारा परित्याग झेलना पड़ा था। मैं उनके कष्टों को क़तई कम नहीं आंक रहा हूं। हां, भगवान राम ने उनके साथ अनुचित किया! इसमें कोई संदेह नहीं है। वे अपनी संतानों के साथ भी न्याय करने में असफल रहे जिन्हें उनके जीवन के प्रारंमिक काल में ही अपने पिता से वंचित कर दिया गया था। लेकिन हममें से कितने लोग जानते हैं कि भगवान राम ने भी पीड़ा भोगी थी? उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग जलसमाधि लेकर किया। कहानी कुछ ऐसी है कि भगवान राम सरयू नदी में बढ़ते चले गए, अपने अंतिम पलों में वे अपनी पत्नी के नाम का जाप कर रहे थे: “सीता, सीता, सीता।” हां, वे अपने परिवार को सुखी नहीं रख पाए थे!

मगर वे ख़ुद भी सुखी नहीं थे। नियम समाज में व्यवस्था लाते हैं! मगर परिवारों के अंदर, प्रेम के ऊपर नियमों की प्राथमिकता आमतौर पर दुख का मार्ग होता है। क्या हम इतिहास या पौराणिक कथाओं के कुछ और ऐसे लोगों के बारे में जानते हैं जो ‘नियमों के आदर्श अनुयायी’ के मूल आदर्श मार्ग पर चले थे? क्या और भी ऐसे प्रबुद्ध नायक रहे हैं जिन्होंने उन लोगों को बहुत प्रेरित किया जिनका वे नेतृत्व करते थे, लेकिन जिनके निजी जीवन, साथ ही उनके परिवारीजनों के जीवन भी पीड़ा से भरे थे? महात्मा गांधी के बारे में क्या कहेंगे? उन्होंने स्वतंत्रता के लिए एक शांतिपूर्ण संघर्ष में हमारे राष्ट्र को एक किया था। उन्होंने भारतवासियों, नहीं, दुनिया, को सिखाया कि हिंसा जवाब नहीं होनी चाहिए। आज राष्ट्रपिता के रूप में हम उनका आदर करते हैं। लेकिन न केवल उन्होंने पिता की भूमिका में संघर्ष किया, बल्कि कस्तूरबा जी के पति के रूप में भी चुनौतियों का सामना किया इतिहास के महानतम भारतीयों में से एक गौतम बुद्ध पर विचार करते हैं।

वे दार्शनिक उपायों का ऐसा भंडार छोड़ गए थे जो आज भी ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करने में लाखों लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी उदारता, उनकी करुणा, और ज्ञान पूजनीय हैं। उनका मध्यमार्ग अपनाने योग्य है। लेकिन एक पिता, पुत्र और पति के रूप में उन्होंने भी संघर्ष किया। ज्ञान की खोज के लिए वे अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को त्यागकर चले गए थे। वास्तव में, जहोंने अपने पुत्र को जो नाम दिया था, वह मानव बंधनों पर विकसित हो रहे उनके विचारों का संकेतक था! राहुल का अर्थ है ज़ंजीरें या बेड़ियां।

उन्होंने राहुल को संघ में भी तभी स्वीकार किया था जब उन्होंने पुत्र के रूप में अपने अधिकारों का त्याग कर दिया और पंथ में मात्र एक अन्य भिक्षुक बनकर रहे। इन महान व्यक्तियों पर गहराई से विचार करें। उनसे प्रेम करने की हमारे पास हरेक वजह है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को बलिदान कर दिया ताकि हम एक बेहतर जीवन जी सकें। हां, अगर हम उनका परिवार होते, तो हमारे पास शिकायत करने की वजह हो सकती थी। और अब मुझे बताएं। भगवान राम के बारे में आप क्या सोचते हैं? मैं तो बहुत स्पष्ट हूं। और मैं ज़रा सी भी हिचकिचाहट के बिना कहता हूं: जय श्री राम। राम की महिमा बनी रहे।

Leave a Comment