पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर की सेना

पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर की सेना: अप्रेल 1526 में बाबर अपनी सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। वह अपने साथ 12 हजार सैनिक लाया था किंतु मार्ग में बहुत से भारतीय सैनिक भी उसके साथ हो लिये। इस प्रकार जब बाबर पानीपत के मैदान में पहुँचा तो उसके सैनिकों की संख्या 25 हजार हो चुकी थी। बाबर की तैयारी: बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनानायक था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। चूँकि बाबर की सेना इब्राहीम लोदी की सेना की अपेक्षा संख्या में केवल एक-चौथाई थी इसलिये बाबर ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अश्वारोहियों तथा तोपखाने के संयुक्त प्रयोग का निश्चय किया। उसने सबसे पहले अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा की व्यवस्था की ताकि शत्रु अचानक उसकी सेना में न आ घुसे। बाबर ने अपनी सेना के एक पक्ष की सुरक्षा के लिये पानीपत नगर को ढाल के रूप में प्रयुक्त किया।

अपनी सेना के दूसरे पक्ष की सुरक्षा के लिये खाइयां खुदवाकर उनके दोनों तरफ कटे हुए पेड़ तथा कँटीली झाड़ियां डलवा दीं। बाबर ने सेना के सामने 700 गाड़ियाँ खड़ी करके उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा एक-दूसरे से बँधवा दिया। इन गाड़ियों के पीछे उसने अपनी सेना को सजाया। लोदी की सेना: इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। उसके पास लगभग दो हजार हाथी थे। इन हाथियों को तोपखाने का सामना करने की शिक्षा नहीं दी गई थी। इसलिये यह सम्भावना अधिक थी कि तोपेखाने की आग तथा गोलों की आवाज से बिगड़कर हाथी उलटे लौट पड़ेंगे तथा अपने ही सैनिकों को रौंद डालेंगे किंतु इब्राहीम लोदी को, हाथियों को प्रयुक्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझा। लोदी की तैयारी: इब्राहीम लोदी अदूरदर्शी सुल्तान था। उसने बाबर के आक्रमण की कोई गंभीर तैयारी नहीं की।

उसे अपनी सेना की विशालता पर पूरा विश्वास था। इसलिये जब बाबर ने पंजाब पर अधिकार कर लिया तब इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना लेकर दिल्ली से पंजाब की ओर चल पड़ा तथा पानीपत के मैदान में आ डटा। बाबर की विजय: 12 अप्रेल 1526 को दोनों सेनाएं एक दूसरे के समक्ष आ खड़ी हुईं। नौ दिन तक दोनों सेनाएँ एक दूसरे के समक्ष डटी रहीं। अन्त में 21 अप्रेल को इब्राहीम लोदी ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। इब्राहीम की सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन नहीं हो सका। बाबर की सेना ने इब्राहीम लोदी की सेना को चारों ओर से घेरकर उस पर तोपेखाने तथा बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। यह युद्ध प्रातः 9 से 10 बजे के बीच आरम्भ हुआ तथा दोपहर बाद तक भयंकर रूप से होता रहा।

अंत में इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। उसके 15 हजार सैनिक मारे गये और शेष सेना लड़ाई के मैदान से भाग खड़ी हुई। इब्राहीम लोदी स्वयं लड़ता हुआ मारा गया। इस प्रकार बाबर को पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय प्राप्त हो गई। पानीपत के युद्ध में बाबर की विजय के कारण यद्यपि इब्राहीम लोदी की सेना बाबर की सेना की तुलना में अधिक विशाल थी परन्तु बाबर ने छोटी सेना की सहायता से ही उस पर विजय प्राप्त कर ली। इस विजय के निम्नलिखित कारण थे

बाबर का कुशल सेनापतित्त्व

– (1.) बाबर का कुशल सेनापतित्त्व: बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनापति था। उसे युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। वह अनेक युद्धों में सेना का संचालन करके युद्ध कला की व्यवहारिक बारीकियों का ज्ञान प्राप्त कर चुका था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी युद्ध के अनुभव से शून्य था। उसने इससे पहले एक भी बड़े युद्ध में भाग नहीं लिया था। न ही वह विदेशी रणपद्धतियों से परिचित था। ऐसी स्थिति में वह बाबर की सेना का सामना करने की क्षमता नहीं रखता था।

बाबर को योग्य सेनापतियों की सेवाएँ

(2.) बाबर को योग्य सेनापतियों की सेवाएँ: बाबर यद्यपि स्वयं प्रधान सेनापति था परन्तु अपनी सेना के विभिन्न अंगों का संचालन उसने बड़े ही योग्य तथा कुशल सेनापतियों को सौंप रखा था। उसे दो तुर्की सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त थीं जो नवीन रण-पद्धतियों का उपयोग करने में दक्ष थे। बाबर का पुत्र हुमायूँ भी कुशल योद्धा तथा दक्ष सेनापति था।

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