पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम पानीपत का प्रथम युद्ध भारत के निर्णयात्मक युद्धों में से है। इसने भारत की राजनीति से एक युग का अंत करके दूसरे युग का आरम्भ कर दिया। उत्तर भारत की राजनीति में इस युद्ध ने भारी फेर बदल कर दिया। (1.) लोदी वंश का अंत: इस युद्ध ने लोदी वंश के भाग्य का उसी प्रकार निर्णय कर दिया जिस प्रकार तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश के भाग्य का निर्णय कर दिया था। लोदी वंश सदा के लिये अस्ताचल में चला गया।

दिल्ली सल्तनत का अंत:

(दिल्ली सल्तनत का अंत: लोदी वंश के पराभव के साथ ही दिल्ली सल्तनत का युग भी समाप्त हो गया। उत्तर भारत में एक नया वंश शासन करने के लिये आ गया। (3.) भारत में मुगल सम्राज्य की स्थापना: पानीपत की पहली लड़ाई का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हो गई जो अपनी शान-शौकत, सैनिक शक्ति तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में मुस्लिम जगत् के राज्यों में सबसे अधिक महान् था और जो रोमन साम्राज्य की बराबरी का दावा कर सकता था।

राजधानी दिल्ली के स्थान पर आगरा

राजधानी दिल्ली के स्थान पर आगरा स्थानांतरित: बाबर दिल्ली में कुछ ही दिन रहा। वह दिल्ली से आगरा चला गया और वहीं पर सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा। अब आगरा ही उसकी राजधानी बन गया।

अफगानों के संगठन पर बुरा प्रभाव

(5.) अफगानों के संगठन पर बुरा प्रभाव: लोदी वंश के उदय के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उत्तरी पंजाब में अफगान अमीरों का दबदबा स्थापित हो गया था किंतु इस युद्ध ने अफगानों के संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनका नैतिक बल कमजोर हो गया।

जन साधारण में भय

(6.) जन साधारण में भय: पानीपत की पराजय के बाद न केवल लोदी सेना के सैनिक वरन् जन साधारण भी आक्रमणकारियों से भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ा हुआ। किलेबंदी वाले नगरों के फाटक बन्द कर दिये और लोग अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने लगे।

बाबर के गौरव में वृद्धि

(7.) बाबर के गौरव में वृद्धि: पानीपत की विजय से बाबर के गौरव तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई और उसकी गणना एशिया के महान् विजेताओं में होने लगी।

बाबर को अपार धन की प्राप्ति

(8.) बाबर को अपार धन की प्राप्ति: बाबर को दिल्ली तथा आगरा से अपार धन की प्राप्ति हुई। इससे पहले उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी। भारत से मिले धन को बाबर ने मुक्त हस्त से अपने सैनिकों में बंटवाया। उसने समरकंद, ईराक, खुरासान व काशनगर में स्थित अपने सम्बन्धियों को भी उपहार भेजे। मक्का एवं मदीना में पवित्र आदमियों को भी उसने भेंट भिजवाई। उसकी इस उदारता के लिये उसे कलंदर नाम दिया गया।

राजपूतों में निराशा

(9.) राजपूतों में निराशा: इस युद्ध से राजपूतों की बड़ी निराशा हुई क्योंकि लोदी साम्राज्य के बाद दिल्ली में राजपूत राज्य स्थापित करने का उनका स्वप्न समाप्त हो गया । पानीपत के युद्ध के उपरान्त बाबर की समस्याएँ पानीपत की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार स्थापित कर लिया परन्तु उसे अनेक समस्याओं का सामना करना था। उसकी प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार से थीं

– (1.) जन साधारण में अविश्वास की समस्या: बाबर की पहली समस्या जन साधारण में विश्वास उत्पन्न करने की थी जो या तो अपने नगरों को छोड़कर भागे जा रहे थे या नगरों के फाटकों को बन्द करके अपनी सुरक्षा करने में लगे हुए थे। लोग तैमूर लंग के आक्रमण को भूले नहीं थे इसलिये मंगोल भारत में घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे।

(2.) अराजकता की समस्या: शासन के प्रति जन साधारण में अविश्वास के कारण सरकारी कर्मचारी भी अपना काम छोड़कर बैठ गये। इस कारण चारों ओर अराजकता फैल गई। बाजारों में खाद्य सामग्री की कमी हो गई। अवसर पाकर चोर तथा डकैत जन साधारण को लूटने लगे।

(3.) अफगान सरदारों की समस्या: पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु हो जाने से अफगानों का संगठन बिखर गया। इस कारण अफगान सरदार अपनी सेनाओं के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। इनमें से अनेक सरदार छोटे-छोटे भू-भागों पर स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा: दिल्ली तथा आगरा विजय करने के पश्चात् बाबर के सैनिक तथा सरदार अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर हो रहे थे। यद्यपि बाबर ने दिल्ली तथा आगरा से प्राप्त विपुल धन अपने सैनिकों तथा सरदारों में मुक्त हस्त से बाँट दिया था परन्तु अब वे भारत में ठहरने के लिए तैयार नहीं थे। ये सैनिक पहाड़ियों तथा घाटियों के निवासी होने के कारण भारत की गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे थे। चूंकि अधिकतर किसान अपनी खेतीबाड़ी छोड़कर भाग खड़े हुए थे इसलिये उत्तर भारत में खाने-पीने की सामग्री का बड़ा अभाव हो गया था। जब इन सैनिकों एवं सरदारों को यह ज्ञात हुआ कि बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया है तब वे समझ गये कि उन्हें भी बहुत दिनों तक भारत में रहना पडे़गा और निरन्तर युद्ध तथा संघर्ष करना पडे़गा। चूंकि अब उनके पास पर्याप्त धन था इसलिये वे अपना शेष जीवन युद्धों में बिताने की बजाय आराम से अपने घरों में बिताना चाहते थे।

(5.) राणा सांगा की समस्या: इन दिनों राजपूतों का नेता मेवाड़ का शासक राणा संग्रामसिंह था जिसे राणा सांगा भी कहते हैं। वह अट्ठारह युद्धों में विजय प्राप्त कर चुका। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। उसके शरीर पर अस्सी घावों के चिह्न थे। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। पानीपत के युद्ध में वह भाग नहीं ले सका था क्योंकि उसे गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह की ओर से आक्रमण की आशंका थी परन्तु अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और राणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ पर बाबर ने अधिकार कर लिया था। राणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में राणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की कामनाओं पर पानी फेर दिया था।

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