प्रसन्नमना धार्मिक एवं उदारवादी

मैं शिव भक्त हूं। और मैं उतना ही भक्त हूं जितना कोई हो सकता है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अपने घर के पूजाघर में मैंने बीच में भगवान शिव की प्रतिमा रखी है। उसके पास ही, बेशक, अन्य हिंदू देवताओं की प्रतिमाएं हैं, जैसे भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान गणेश, भगवान कार्तिक, दुर्गा मां, काली मां, पार्वती मां, सरस्वती मां, लक्ष्मी मां, और भी अन्य कई (हम हिंदुओं के बहुत सारे भगवान हैं!)। उतनी ही मुख्यता से आप काबा की, मदर मेरी, जीज़स क्राइस्ट, गौतम बुद्ध, गुरु नानक, पैग़ंबर ज़रथुष्ट्र, और डेविड के स्टार को पाएंगे। मैं सबकी पूजा और सम्मान करता हूं।

मेरे मित्र मज़ाक़ में कहते हैं कि मैं अपने दांव खेल रहा हूं; यह सुनिश्चित करते हुए कि मुझ पर ‘ईश्वर’ की कृपा हो जाए, इससे बेपरवाह कि ‘सच्चा धर्म’ क्या है! मगर मैं तो बस अपने देश की संस्कृति के प्रति ईमानदारी बरत रहा हूं। अपनी किशोरावस्था में मैं नास्तिक था; कई साल तक मैं ऐसा ही रहा। नव्वे के दशक के आरंभ में बार–बार हो रहे सांप्रदायिक दंगों ने मुझे धर्म से दूर कर दिया था। मेरे धर्मनिष्ठ पिता ने मुझे समझाने की कोशिश की कि धार्मिक उग्रवाद का सामना धर्मनिरपेक्ष उग्रवाद से नहीं किया जा सकता, क्योंकि उग्रवाद का कोई भी रूप कारगर नहीं होता है।

धार्मिक असहिष्णुता का विरोध धर्मनिरपेक्ष असहिष्णुता से करने से केवल एक दानव की जगह दूसरा दानव ले लेता है। उस समय अपने पिता के शब्दों का महत्व मुझे समझ नहीं आया था। अब आता है। धार्मिक उग्रवाद का जवाब धार्मिक उदारवाद में निहित है। यह हमें अपने अगले प्रत्यक्ष सवाल पर लाता है: उदारवाद क्या है? आधुनिक भारतीय जनता ने उदारवाद की परिभाषा को तोड़–मरोड़ दिया है। उदार होने को अक्सर वामपंथी समझा लिया जाता है। मगर बहुत से वामपंथी उतने ही अनुदारवादी है जितना कि ते दक्षिणपंथी उग्रवादी जिनका वे विरोध करते हैं। उदारवाद की सबसे अच्छी परिभाषा एक उद्धरण में सामने आती है जिसे लोकप्रिय तौर पर, अलबत्ता ग़लत ही, वॉल्तेयर का माना जाता है;

वास्तव में इसे एवलिन हॉल ने लिखा था: “आप जो कह रहे हैं मैं उसे अस्वीकार करती हूं, मगर मैं मरने तक यह कहने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगी।” इसे धार्मिक उदारवाद से कैसे जोड़ेंगे? बहुत सरल है। मेरे पास अपना सच्चा धर्म है और आपके पास आपका अपना सच्चा धर्म है। मैं अपने धर्म का पालन करने के आपके अधिकार का सम्मान करूंगा और आपको अपने धर्म का पालन करने के मेरे अधिकार का सम्मान करना होगा। उदारवाद को उच्चवर्ग द्वारा लागू किया जाना चाहिए, (और कभी–कभी संविधान द्वारा अनिवार्य होना चाहिए) अगर समाज मूलत: कट्टर है तो। वास्तव में, हमने अनेक समाजों में ऐसा देखा है। भारत में ऐसा नहीं है। हम मूलत: ऐसा समाज हैं जो वास्तव में धार्मिक और उदारवादी है। कहा जा सकता है

कि हम एवलिन हॉल के विचारपूर्ण कथन से परे जाते हैं। हम उन धर्मों को ‘बर्दाश्त’ करने का ढोंग नहीं करते जिन्हें हम अंदरूनी तौर पर ‘नापसंद’ करते हैं; हम सक्रियतापूर्वक उन धर्मों का सम्मान करते हैं और जहें अपनाते हैं जो हमसे भिन्न होते हैं। ऋग्वेद इस दर्शन को ख़ूबसूरती से अंगीकार करता है: एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति, सत्य एक है, मगर बुद्धिमान लोग इसे अनेक रूप से कहते (या जानते) हैं। राजस्थान के मुस्लिम मांगणियार रामायण पर आधारित धार्मिक गीत गाते हैं और ऐसा करने में ज़रा भी कम मुसलमान सा महसूस नहीं करते। मुंबई का माउंट मेरी चर्च ईसाइयों के साथ ही खुले दिल से हिंदुओं, मुसलमानों और अन्य सभी समुदायों का स्वागत करता है,

उन्हें प्रार्थना और भक्ति की अपनी धारणाओं को व्यक्त करने की आज़ादी देता है। मुस्लिम सूफ़ी संत की मज़ार अजमेर शरीफ़ को देखें, जहां हर साल भारत के हर समुदाय के लोग पहुंचते हैं। दीवाली से उत्पन्न होने वाले जीवनोल्लास के बारे में सोचें जिसे हिंदू, मुस्लिम और ईसाई प्रकाशोत्सव के रूप में मनाते हैं। यह अनमोल है और इसे भारत में बरक़रार रखना चाहिए: अपने धर्म से जुड़े रहकर दूसरे धर्मों का न केवल सम्मान करने बल्कि उनका जश्न भी मनाने की क्षमता। हमें समझाना होगा कि धार्मिक उग्रवाद को केवल धार्मिक उदारवाद से ही परास्त किया जा सकता है, हमारे उच्चवर्ग के ख़्याली महलों और धर्मनिरपेक्ष प्रवचनों से नहीं। आज हमारे सामने अनेक सामाजिक समस्याएं हैं; उनमें से अनेक सदियों के सामाजिक पतन का नतीजा हैं। मुझे विश्वास है

धार्मिक उदारवादी—ख़ासकर वे जो राजनीति से तटस्थ रहते हैं—ऐसे कई मसलों को हल करने में मदद कर सकेंगे जो हमारे रूबरू हैं। लोगों को अगर महसूस होगा कि उनका धर्म उनसे अपने दमनकारी सामाजिक बर्ताव को बदलने को कहता है तो वे आसानी से ख़ुद को बदल सकेंगे। स्त्रियों को शक्तिशाली पदों पर नहीं होना चाहिए? वाक़ई? शक्ति मां की शानदार कहानियों को सुनें और अपनी सोच को बदलें। स्त्रियों को धार्मिक अनुष्ठान नहीं करने चाहिए या आध्यात्मिक बातों का हिस्सा नहीं बनना चाहिए? बृहदारण्यक उपनिषद में महर्षि याज्ञवल्कय और महर्षिका मैत्रेयी के बीच शास्त्रार्थ पढ़ें तो आप समझ जाएंगे कि आप कितने ग़लत हैं। स्त्रियों को काम नहीं करना चाहिए? फिर आप इस तथ्य को किस तरह समझाएंगे कि पैग़ंबर मुहम्मद की पत्नी, ख़दीजा अल–कुबरा, एक व्यापारी थीं और उनसे विवाह करने से पहले पैग़ंबर उनके मातहत थे। जन्म पर आधारित जाति प्रथा देवताओं द्वारा बनाई गई है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती? महर्षि सत्यकाम और महर्षि वाल्मीकि की कहानियां पढ़ें,

उनसे सीखें और जाति प्रथा पर हमला करें जैसी कि वह आज है। आप ऐसे धार्मिक निर्देशों या प्राचीन परंपराओं पर सवाल नहीं उठा सकते जो बेमानी लगते हैं? यह सच नहीं है। भगवद्गीता के अत्यंत गूढ़ अठारहवें अध्याय को पढ़ें और निर्णय करने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करें जैसा कि भगवान कृष्ण आपको निर्देश देते हैं। अपने से बड़ों का सम्मान करें, भले ही ते ग़लत हों? हमारे धर्मशास्त्र कुछ भिन्न बात कहते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद स्पष्ट रूप से कहता है: “उनका सम्मान करें जो सम्मान करने के योग्य हों।” धार्मिक उदारवादी भारत की अनेक सामाजिक समस्याओं को कम कर सकते हैं।

और हमारे लिए यह आसान है क्योंकि हम अपने देश में एक विशाल बहुमत हैं। दुर्भाग्य से, क्याने सार्वजनिक संवाद को धर्मनिरपेक्षों और धार्मिक कट्टरपंथियों के ऊपर छोड़ दिया है। हमें खड़े होना होगा। हमें ज़ोर से बोलना होगा। हमें अपने–अपने धर्मों की उदारवादी व्याख्याओं को सामने लाना होगा। यह हमारा राष्ट्रभक्ति का कर्तव्य है!

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