बाबर का काबुल, गजनी तथा कान्धार पर अधिकार ओर भारत पर आक्रमण

इसे सुनकर बाबर के छोटे भाई जहाँगीर ने फरगना पर अधिकार कर लिया। यह सुनकर बाबर सेना सहित फरगना के लिये रवाना हुआ किंतु वह जहाँगीर से फरगना प्राप्त नहीं कर सका। निराश होकर वह समरकंद लौटा किंतु तब तक समरकंद भी उसके हाथ से निकल गया। कुछ दिनों तक इधर-उधर ठोकरें खाने के बाद बाबर ने पुनः फरगना पर आक्रमण किया तथा उसने फरगना पर अधिकार कर लिया किंतु 1500 ई. में फरगना पुनः उसके हाथ से निकल गया। बाबर ने पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। 1502 ई. में शैबानी ने बाबर पर आक्रमण किया। सराय-पुल नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान हुआ जिसमें बाबर परास्त हो गया।

समरकंद पर शैबानी का अधिकार हो गया। बाबर को अपनी बहिन का विवाह शैबानी के साथ कर देना पड़ा। इस प्रकार तीसरी बार समरकंद बाबर के हाथ से निकल गया। काबुल, गजनी तथा कान्धार पर अधिकार 1505 ई. में बाबर ने काबुल तथा गजनी पर आक्रमण किये। ये दोनों शहर बड़ी सरलता से बाबर के अधिकार में आ गये। 1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग करके बादशाह की उपाधि धारण कर ली। इसी वर्ष उसने गान्धार पर अधिकार कर लिया।

1513 ई. में शैबानी के मर जाने पर बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इस बार उजबेगों ने बाबर को समरकंद से मार भगाया। कांधार भी बाबर के हाथ से निकल गया। युद्धों का विशद अनुभव बाबर का अब तक का जीवन युद्धों में बीता था जिनमें से कई युद्ध उसने हारे तथा कई युद्ध जीते किंतु इन युद्धों ने उसे एक जबर्दस्त योद्धा बना दिया। उजबेगों से युद्ध करने के दौरान बाबर ने तुलगमा पद्धति सीखी। मंगोलों एवं अफगानों से युद्ध करते समय उसने अपनी सेना को शत्रु की आँखों से छिपा कर रखना सीखा। ईरानियों से उसने बंदूक का प्रयोग करना तथा सजातीय तुर्कों से उसने गतिशील अश्वारोहिणी का संचालन करना सीखा।

अपने शत्रुओं से ही उसने युद्ध क्षेत्र में योजनाबद्ध व्यूह रचना करना सीखा। इस प्रकार वह एक जबर्दस्त योद्धा एवं सेनापति बन गया। ई.1514 में बाबर को उस्ताद अली नामक एक तुर्क तोपची की सेवाएँ प्राप्त हुईं। इस तोपची की सहायता से बाबर ने एक शक्तिशाली तोपखाना तैयार किया। भारत पर आक्रमण समरकंद तथा फरगना हाथ से निकल जाने के कारण वह मध्य एशिया से निराश हो चुका था।

कंदहार भी उसके हाथ से निकल चुका था। काबुल तथा गजनी के अनुपजाऊ प्रदेश बाबर की महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते थे इसलिये उसने भारत पर अपनी दृष्टि गड़ाई। बाबर के आक्रमण के समय भारत की दशा जिस समय बाबर ने आक्रमण करने का निर्णय लिया, उस समय भारत की राजनीतिक दशा हमेशा की तरह अत्यंत शोचनीय थी तथा अनेक परिस्थितियाँ बाबर के अनुकूल थीं। इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार से है-

(1.) दिल्ली सल्तनत का विघटन: तैमूर के आक्रमण के पश्चात् उत्तरी भारत फिर कभी नहीं संभल सका था। दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर अनेक तुर्क तथा अफगान अमीरों ने छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे। इस कारण दिल्ली सल्तनत की सीमाएं सिकुड़कर एक छोटे से प्रांत के रूप में रह गई थीं।

(2.) इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अमीरों का षड़यंत्र: इन दिनों दिल्ली में इब्राहीम लोदी शासन कर रहा था। उसके अमीर उससे असंतुष्ट थे और उसके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के षड्यन्त्र रच रहे थे।

(3.) जौनपुर तथा दिल्ली की प्रतिद्वंद्विता: जौनपुर में शर्की सुल्तानों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था और दिल्ली सल्तनत के प्रतिद्वन्द्वी बन गये थे। उनकी दृष्टि सदैव दिल्ली के तख्त पर लगी रहती थी और वे उसे हड़पने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

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