बिहार में स्वतंत्र राज्य की स्थापना

(बिहार में लोहानी अथवा नुहानी अफगानों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। बंगाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना: हुसैनशाह तथा नसरत शाह ने बंगाल में स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे तथा दक्षिण बिहार पर अधिकार करने के लिये लालायित थे। नसरत शाह द्वारा तिरहुत पर अधिकार: नसरत शाह ने 1521 ई. में तिरहुत पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा को मुंगेर तथा हाजीपुर तक बढ़ा लिया। यदि लोहानी अमीर उसका विरोध न करते तो जौनपुर तथा चुनार दोनों ही खतरे में पड़ जाते। इसके विपरीत यदि लोहानी अमीर नसरत शाह से संधि कर लेते तो दिल्ली सल्तनत का सम्पूर्ण पूर्वी भाग खतरे में पड़ जाता।

उड़ीसा में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना

(: उड़ीसा में भी एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई थी। इसके शासकों की रुचि उत्तरी भारत की राजनीति में उतनी नहीं थी जितनी दक्षिण भारत की राजनीति में थी। (8.) मेवाड़ के शासक राणा सांगा का उदय: दिल्ली सल्तनत के दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में राजपूताना स्थित था जिसमें राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य थे। इन राजपूतों ने राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के विरुद्ध प्रबल संघ बना लिया था। राणा सांगा वीर योद्धा था और अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर चुका था। 1519 ई. में राणा सांगा ने मालवा के शासक महमूद (द्वितीय) को कैद कर लिया। 1520 ई. में सांगा ने अहमदनगर के शासक मुबारिजुल को परास्त करके अहमदनगर पर अधिकार कर लिया था। अब सांगा के लिये दिल्ली की ओर बढ़ने से पहले केवल गुजरात से निबटना ही शेष रह गया था।

गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह का भय:

(9.) गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह का भय: मालवा तथा अहमदनगर की विजयों के फलस्वरूप राणा सांगा, गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह से सीधा संघर्ष करने की स्थिति में आ गया था। दिल्ली सल्तनत के लिए यह स्थिति बड़ी भयावह थी। यदि राणा सांगा को मुजफ्फरशाह के विरुद्ध सफलता प्राप्त हो जाती तो उसकी विजयी सेना निश्चित रूप से राजपूताने के पूर्व में स्थित दिल्ली की ओर बढ़ती और दिल्ली सल्तनत के लिए भयानक संकट उत्पन्न कर देती और यदि राणा की पराजय हो जाती तो मुजफ्फर शाह के लिए दिल्ली तक का मार्ग साफ हो जाता। (10.) पंजाब में दौलत खाँ लोदी का स्वतंत्र राज्य: दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पंजाब में लोदी अमीर बड़े शक्तिशाली हो गये थे। वे दौलत खाँ के नेतृत्व में संगठित थे। दौलत खाँ लोदी, तातार खाँ का पुत्र था जो दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी का घोर विरोधी था। दौलत खाँ लगभग बीस वर्षों से पंजाब में स्वतंत्र शासक की तरह शासन कर रहा था। वह इब्राहीम लोदी को किसी भी प्रकार की सहायता देने के लिए तैयार नहीं था। वास्तव में वह बाबर तथा इब्राहीम लोदी दोनों को ही अपना शत्रु समझता था। वह जानता था कि चक्की के इन दो पाटों के बीच में पड़कर वह कभी भी पिस सकता है।

आलम खाँ का षड़यंत्र: दौलत खाँ लोदी के साथ सुल्तान इब्राहीम

(11.) आलम खाँ का षड़यंत्र: दौलत खाँ लोदी के साथ सुल्तान इब्राहीम लोदी का चाचा आलम खाँ लोदी भी इन दिनों पंजाब में विद्यमान था। वह बहुत दिनों से आगरा पर दृष्टि लगाये हुए था और इब्राहीम लोदी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता था। (12.) सिंध का राज्य: मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद से ही सिंध स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय सिंध पर अरब वालों का अधिकार था। (13.) काश्मीर का राज्य: बाबर के आक्रमण के समय काश्मीर का राज्य महत्वपूर्ण था। उस समय कश्मीर के प्रधान वजीर ने सुल्तान मुहम्मदशाह को अपदस्थ करके स्वयं सत्ता हथिया ली थी। (14.) खानदेश: खानदेश ताप्ती नदी के किनारे स्थित एक छोटा सा किंतु समृद्ध राज्य था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ महमूद प्रथम का शासन था। (15.)

बहमनी राज्य: बाबर के आक्रमण के समय बहमनी राज्य अपना वैभव खोकर पांच राज्यों- बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा में विभक्त हो चुका था। ये राज्य आपस में लड़ते रहते थे। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण भारत में मुस्लिम शक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी। (16.) विजयनगर राज्य: बाबर के आक्रमण के समय विजयनगर राज्य पर राजा कृष्णदेवराय का शासन था। वह अशोक, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज के समान ख्याति प्राप्त श्रेष्ठ सम्राट था। उसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था। बाबर ने लिखा है कि सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। (17.) पुर्तगाली राज्य: बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार कर लिया था। उनके कारण भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता व्याप्त थी।

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