भगवान शिव: असंगतियों के देवता

मेरे एक युवा पाठक ने भगवान शिव को देवताओं का ‘ड्यूड’ कहा था। आप सोच सकते हैं कि किस बात ने उन्हें आधुनिक स्त्री-पुरुषों के बीच इतना लोकप्रिय बनाया है? वे तो, आख़िर, सिंह की खाल लपेटने वाले एक वैरागी हैं जो अपने शरीर पर राख मलते हैं, ख़ाली समय में अपने भयानक दोस्तों के साथ भांग पीते हैं, और श्मशान घाट में डांस करते हैं। क्या यह ‘कूल’ देवता जैसा सुनाई देता है? यह तो इसका विपरीत सा मालूम देता है, है ना? लेकिन विपरीत होना ही उनका तरीक़ा है। और इसी में राज़ छिपा है उस गहन समर्पण भाव का जो वे उत्पन्न करते हैं। मैं थोड़ा सा असहमत हूं और एक ज़माने पहले गुज़र चुके अंग्रेज़ लेखक चार्ल्स डिकेंस की याद दिलाना चाहता हूं;

दरअसल यह उनकी एक पुस्तक, ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़, की एक पंक्ति है: वह बेहतरीन समय था, वह बदतरीन समय था। यह हमारी वर्तमान दुनिया का सारगर्भित वर्णन करने के लिए भी लिखा गया हो सकता था। हम जटिल विरोधों के दौर में रहते हैं, जो साथ ही साथ, गोरखधंधों में लिपटे हुए हैं! कुछ मायनों में, एक बार फिर, यह कहा जा सकता है कि यह बेहतरीन दौर है, साथ ही साथ बदतरीन दौर भी है। हज़ारों साल में स्त्रियों के पास जितने अधिकार थे, आज उनके पास उससे कहीं ज़्यादा अधिकार हैं, और फिर भी स्त्रियों के ख़िलाफ़ जुर्मों में कोई कमी नहीं है। धार्मिक उदारवाद की दुनिया भर में बलपूर्वक रक्षा की जा रही है जो पहले कभी इतनी अच्छी तरह जुड़ी हुई नहीं थी; तकनीक और उत्सुकता का परिणाम विभिन्न मतों के बीच एक स्वस्थ संवाद के रूप में सामने आया, मगर फिर भी धार्मिक कट्टरवाद दुनिया की धज्जियां उड़ाए दे रहा है। मानव इतिहास में शायद पहली बार निर्धन जायज़ तौर पर ऐसी जीवनशैली का सपना देख सकता है जो कि पहले अकल्पनीय ही था,

मगर फिर भी हमारे आर्थिक विकास की तीव्र गति पर्यावरणीय पतन की धमकी दे रही है। सामाजिक मीडिया सारी दुनिया को क़रीब लाया है और हमारी ज़िंदगी बज़ाहिर तौर पर लोगों से भर गई है, मगर फिर भी बहुत से लोग हताशाजनक रूप से एकाकी हो गए हैं। सैक्स मीडिया और सार्वजनिक स्थानों पर छाया हुआ महसूस होता है मगर फिर भी यौनेच्छा और इच्छा को लेकर लोग भयानक अपराधबोध से भरे हुए हैं। हम प्रेम के बेइंतेहा सार्वजनिक प्रदर्शनों और जश्नों से घिरे हुए हैं, मगर वह जज़्बाती सहारा गुम हो गया महसूस होता है जो सरल, मगर गहरा, अघोषित प्यार प्रदान करता है। हां, यह गहन परिवर्तन और विरोधों का दौर है। तो क्या यह हैरानी की बात है कि वे भगवान जो हमें ऐसे दौर में ला सकते हैं, वे विपरीतताओं के देवता भी हो सकते हैं? निस्संदेह, वे ऐसे वस्त्र धारण करते हैं जिसे कोई सभ्य समाज में नहीं पहनेगा, मगर वे कई कलाओं के जनक भी हैं जो उच्चवर्ग को पसंद हैं। वे नटराज हैं। पौराणिक कथा कहती है कि नीलकंठ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के रहस्यों को महर्षि नारद को बताया था। वे भांग पीते हैं, वह नशीली दवा जो मन के सामने एक दिव्य संसार उजागर करती है मगर भौतिक शरीर को नुक़्सान पहुंचाती है।

इसी के साथ, वे योग के प्रणेता आदि योगी भी हैं, जो शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और आध्यात्मिक संतुलन का मार्ग है। वे बेढंगे, असभ्य और यहां तक कि भयंकर साथियों को पसंद करते हैं मगर फिर भी वह प्यार और सम्मान जिससे ते अपनी पत्नी के साथ व्यवहार करते हैं, सज्जनता के लिए एक सबक़ है। वे वैरागी हैं, आत्मत्याग के सबसे बड़े गुरु जो भौतिक दुनिया को दूर रखना पसंद करते हैं। मगर अपनी पत्नी के साथ उनका श्रृंगारिक प्रेम लोककथाओं का विषय है। उनके प्रतीक, शिव लिंग, को अनेक लोग उत्पति का लैंगिक प्रतीक मानते हैं। वे उच्चवर्ग—विरोधी देवता हैं जो वंचितों, दीनों और हाशिए पर मौजूद लोगों के पक्ष में हैं। मगर सबसे ताक़तवर राजाओं ने उनके विशाल मंदिर बनवाए हैं। वेदों के उत्पत्तिकर्ता के रूप में उनके पास युगों का ज्ञान है मगर फिर भी उनके बालसुलभ भोलेपन के कारण उनके भक्त प्रेम से उन्हें भोलेनाथ कहते हैं। यद्यपि आप उनके ‘रुद्ध रूप’ से भय खा सकते हैं, मगर उनके भक्तों का स्वामित्व भरा प्रेम अटल रहता है। कोई देवता इतने विरोधों से भरा क्यों होगा?

क्योंकि हम ऐसा ही चाहते हैं। वे हमें आकर्षित करते हैं। और फिर वे हमें संतुलित करते हैं। संभ्रांत लोग भगवान शिव की ओर इसलिए आकर्षित होते हैं कि वे कलाओं के देवता हैं। और अगर कोई संभ्रांत सच्चा भक्त है तो वह महादेव से वंचितों के प्रति संवेदनशीलता सीखेगा। एक साधारण व्यक्ति भगवान शिव की ओर इसलिए आकर्षित होता है क्योंकि वे इस तरह से व्यवहार करते हैं मानो वे उनमें से ही एक हों। मगर साधारण व्यक्ति, समय के साथ, भगवान शिव से सीखेगा कि तह भी इच्छा कर सकता है और उसे हासिल कर सकता है; लीजेंडरी कणप्पा नयनर की तरह। महादेव अफ़ीम पीने वाले लोगों को भी आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन अगर वह सच्चा भक्त है तो वह नीलकंठ के फ़लसफ़े में गहरे उतरेगा और सीखेगा कि योग और आध्यात्मिकता उसे कहीं ज़्यादा नशा दे सकते हैं।

और मेरे जैसा एक पूर्व—नास्तिक भगवान शिव की दुनिया में इसलिए खिंचा चला जा सकता है क्योंकि… वे ऐसा चाहते हैं। वे अपने भक्तों का सम्मान करते हैं, और जब मैंने महादेव की कहानियों की गहरी समझ विकसित की तो मैंने जाना कि प्रभु चाहते हैं कि हम सभी धर्मों और देवताओं का सम्मान करें। बहुत बार, शांति पाने के लिए, अपने व्यस्तताओं भरे जीवन को संतुलित करने के लिए हमें विपरीतताओं को अंगीकार करना पड़ता है। मैंने भगवान शिव के प्रति अपने समर्पण से अपना संतुलन और शांति पा ली है। उम्मीद करता हूं कि आप भी पा लेंगे।

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