मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ हुमायूँ का प्रारम्भिक जीवन

मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ हुमायूँ का प्रारम्भिक जीवन बाबर के चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ थीं जिनमें हुमायूँ सबसे बड़ा था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था। उसकी माँ माहम सुल्ताना हिरात के शिया मुसलमान हुसैन बैकरा के खानदान से थी, उसे माहिज बेगम भी कहते थे। हुमायूँ को तुर्की, अरबी, फारसी भाषओं के साथ-साथ युद्ध करने की शिक्षा भी दी गई थी। हुमायूँ अपने पिता के जीवन काल में ही अनेक युद्धों में भाग लेने तथा प्रशासकीय कार्य करने अनुभव प्राप्त कर चुका था। उसने पानीपत तथा खनवा के युद्धों में भाग लेकर अपनी सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया था। बाबर ने उसे बंगाल तथा बिहार के अफगान अमीरों के विद्रोह का दमन करने की जिम्मेदारी दी थी। हुमायूँ ने इस कार्य में पूरी सफलता प्राप्त की। हुमायूँ की सफलताओं से प्रसन्न होकर बाबर ने उसे दो बार बदख्शाँ का शासन प्रबन्ध सौंपा।

बदख्शाँ पर उजबेग लोग बार-बार आक्रमण करते थे परन्तु हुमायूँ ने उजबेगों को दबाकर वहाँ पर शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित की। बाबर ने हुमायूँ को हिसार-फिरोजा तथा सम्भल का शासन सौंपा। आगरा के तख्त की प्राप्ति बाबर की मृत्यु के चार दिन बाद 30 दिसम्बर 1530 को हुमायूँ आगरा के तख्त पर बैठा। इस विलम्ब का कारण यह था कि बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने हुमायूँ के बहनोई मेंहदी ख्वाजा को तख्त पर बैठाने का प्रयत्न किया किंतु बाद में प्रधानमंत्री को यह अनुभव हो गया कि यदि उसने ऐसा किया तो उसका अपना जीवन खतरे में पड़ जायेगा इसलिये उसने हुमायूँ का समर्थन कर दिया। उस समय हुमायूँ 23 वर्ष का था।

उसके बादशाह बनने पर राज्य में खुशियाँ मनायी गईं और दान-दक्षिणा दी गई। राज्य के अफसरों तथा अमीरों ने उसका स्वागत किया और उसकी बादशाहत को सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ यद्यपि हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में विशेष कठिनाई नहीं हुई परन्तु उसका मार्ग बिल्कुल निष्कंटक नहीं था। उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ थीं जिनका निराकरण करना आवयक था-

साम्राज्य की विशालता

(1.) साम्राज्य की विशालता: बाबर ने थोड़े ही दिनों में अपने सैन्यबल से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। यह साम्राज्य पश्चिम में आमू नदी से लेकर पूर्व में बिहार तक फैला था। दक्षिण में मालवा तथा राजपूताना के राज्य उसके साम्राज्य की सीमा पर स्थित थे। इस साम्राज्य को कुछ समय के लिये तो संभाला जा सकता था परन्तु दीर्घकालीन शासन के लिये नवीन शासन व्यवस्थायें करनी आवश्यक थीं। बाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य की कोई शासकीय आधारशिला नहीं रखी गई थी।

साम्राज्य की दुर्बलता

(2.) साम्राज्य की दुर्बलता: हुमायूँ को अपने पिता से एक अव्यवस्थित राज्य मिला था। बाबर ने अपना राज्य अमीरों तथा सरदारों में बाँट दिया था जो अपने-अपने क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तरदायी थे। ये सरदार प्रति वर्ष एक निश्चित राशि सरकारी खजाने में भेजते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर बादशाह को सैनिक सहायता उपलब्ध करवाते थे। यह सामन्तीय प्रथा हुमायूँ के लिए खतरे से खाली नहीं थी। अमीर तथा सरदार कभी भी धोखा दे सकते थे और बादशाह तथा सल्तनत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते थे।

शासन की व्यवस्था

(3.) शासन की व्यवस्था: अभी भारत को जीतने के लिये आवश्यक युद्ध पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए थे कि बाबर की मृत्यु हो गई थी इसलिये हुमायूँ जिस समय तख्त पर बैठा, वह समय युद्ध कालीन परिस्थितियों का था। अभी मुगल तथा अफगान एक दूसरे को उन्मूलित करने में संलग्न थे और उनकी सेनाओं का संचालन निरन्तर होता रहता था। ऐसी स्थिति में हुमायूँ के राज्य में बड़ी राजनीतिक तथा आर्थिक गड़बड़ी फैली हुई थी तथा शासन अस्त-व्यस्त था।

सेना का असन्तोषजनक संगठन

(4.) सेना का असन्तोषजनक संगठन: मुगल सेना का संगठन भी संतोषजनक नहीं था। उसमें मंगोल, उजबेग, तुर्क, चगताई, फारसी, अफगानी तथा भारतीय मुसलमान भर्ती थे। प्रत्येक सेना प्रायः अपने कबीले के नेता की अध्यक्षता में युद्ध करती थी। विभिन्न कबीलों से सम्बन्ध रखने वाली इन सेनाओं में ईर्ष्या-द्वेष व्याप्त था। इस प्रकार मुगल सेना में एकता की भावना नहीं थी। इसलिये युद्ध के समय इस सेना पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता था। कई बार सैनिक टुकड़ियां परस्पर संघर्ष करने लगती थीं। यह स्थिति राज्य के लिये अत्यंत घातक थी।

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