स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया):

इस ग्रन्थ का लेखक निकोलोआ मनूची था। उसका जन्म इटली के वेनिस नगर में 1637 ई. में हुआ था। चौदह वर्ष की अल्पायु में ही वह विश्व भ्रमण के लिए निकल पड़ा। 1650 ई. में वह सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया। मनूची ने दारा की तरफ से उत्तराधिकार युद्ध में भाग लिया। जब दारा सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो वह भी उसके साथ गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किये गये अभियान में भाग लिया। वहाँ से वह गोआ होता हुआ लाहौर पहुँचा जहाँ उसने सात वर्ष बिताये। कुछ समय के लिए उसने शाहआलम की सेवा में भी काम किया। उसके अन्तिम वर्ष मद्रास में बीते। 1717 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। मनूची ने अपने ग्रन्थ की रचना सम्भवतः 1699 से 1705 ई. के मध्य की।

ग्रन्थ का प्रारम्भिक भाग इटालियन भाषा में लिखा। कुछ पृष्ठ पुर्तगाली भाषा में लिखे और शेष भाग फ्रांसीसी भाषा में लिखा। यह एक विशाल ग्रन्थ है। प्रथम बीस अध्यायों में उसकी वेनिस से दिल्ली तक की यात्रा का वृत्तान्त है। दूसरे भाग में तैमूर से शाहजहाँ तक का संक्षिप्त इतिहास है। तीसरे भाग में मंगोल दरबार, उनकी शासन-व्यवस्था, राजस्व-व्यवस्था, हिन्दू राज्यों की शासन-व्यवस्था, हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों तथा पर्व-समारोहों, सड़कों एवं यात्रियों की सुरक्षा इत्यादि का उल्लेख है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में उसने जगह-जगह अपने संस्मरण लिखे हैं। मनूची ने जिन सूत्रों के आधार पर इतिहास पर लिखा है, वे ज्यादा सही नहीं लगते क्योंकि उसकी तिथियाँ सहीं नहीं हैं। तैमूर से शाहजहाँ तक की वंशावली में भी अनेक त्रुटियाँ हैं। क्रमबद्धता की भी कमी है। उसने सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हुए शाहजहाँ के व्यक्तिगत चरित्र पर कई लांछन लगाये जो सही नहीं हैं। औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता तथा उसके दक्षिणी अभियानों, अमीरों एवं अपने सम्बन्धियों के साथ उसके व्यवहार का उल्लेख सत्य के निकट है।

भारत के विभिन्न नगरों तथा शाही महल की गतिविधियों का भी रोचक वर्णन

भारत के विभिन्न नगरों तथा शाही महल की गतिविधियों का भी रोचक वर्णन है। उसने राजस्व सम्बन्धी जो आंकड़े दिये हैं तथा विदेशी व्यापार से होने वाली आय का जो विस्तृत विवरण दिया है, वह काफी महत्त्वपूर्ण है। उसने तत्कालीन भारत के सामाजिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला है परन्तु इस सम्बन्ध में उसका विवरण ज्यादा सही नहीं है। उसने लिखा है कि हिन्दू लोग अस्वच्छ हैं। वस्तुतः वह हिन्दुओं की प्रथाओं को ठीक से समझ नहीं पाया। इन कमियों के उपरान्त भी शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाल की जानकारी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।

उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त संस्कृत तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक ऐतिहासिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। लिखित साहित्य के अतिरिक्त शिलालेखों, सिक्कों तथा स्मारकों से भी मंगोलकालीन शासन के इतिहास की जानकारी मिलती है। मुगलकालीन लिखित स्रोतों की समीक्षा मुगल बादशाहों के इतिहास की जानकारी के लिए स्वयं मुगल बादशाहों, शाही परिवार के सदस्यों तथा राजकीय अधिकारियों के साथ-साथ स्वतंत्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। मंगोल शासकों द्वारा लिखित आत्मकथाएँ तथा अन्य लेखकों द्वारा लिखित उनकी जीवनियाँ भी उस काल के इतिहास को जानने का प्रमुख स्रोत हैं। ये स्रोत अधिकांशतः उन लोगों के माध्यम से प्राप्त हुए हैं जो या तो स्वयं घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे अथवा उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों से सुनकर अपनी रचनाएँ लिखी थीं। मुगलकालीन फारसी लेखकों की कमजोरियाँ मुगलकालीन फारसी लेखकों के विवरण को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

(1.) अधिकांश लेखकों ने राज्याश्रय के अन्तर्गत अथवा सुल्तान या सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे। अतः वे अपने शासक के पक्ष को ही प्रतिपदित करते रहे और उसके दोषों को उजागर करने का साहस नहीं कर सके।

(2.) फारसी लेखक अपनी संकीर्ण तथा धार्मिक कट्टरता से ऊपर नही उठ सके। परिणामस्वरूप वे एक इतिहासकार की निष्पक्षता को भुला बैठे।

(3. फारसी लेखकों ने घटनाओं की तिथियाँ बहुत कम दी हैं। कई लेखकों ने गलत तिथियों लिखी हैं। इस कारण इतिहास का निर्माण करने में कठिनाई उत्पन्न हो जाती है।

(4.) फारसी लेखकों ने शासकीय वर्ग एवं अमीर वर्ग के रहन-सहन, खान-पान, आमोद-प्रमोद पर ही अधिक ध्यान दिया। उनकी रचनाओं में सर्वसाधारण की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर पर्याप्त प्रकाश नहीं डाला गया।

(5.) अधिकांश लेखकों ने घटनाओं के कारणों और सन्दर्भों में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। विदेशी लेखकों की कमजोरियाँ विदेशी लेखकों के विवरण भी अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। इसके कई कारण हैं-

(1.) विदेशी लेखक यात्री के रूप में इस देश में आये थे इस कारण वे बहुसंख्य हिन्दू जनता तथा अल्पसंख्य मुस्लिम शासकों की सोच के अंतर को ढंग से नहीं समझ सके। (2.) विदेशी लेखकों ने भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को समझने में भारी भूल की। (3. विदेशी लेखक पश्चिम की श्रेष्ठता के पूर्वाग्रह से पीड़ित थे। (4.) विदेशी लेखकों को भारत के मूल इतिहास की जानकारी नहीं होने के कारण उन्होंने राजनीतिक घटनाओं का विवरण लिखने में अनेक त्रुटियाँ कीं। (5.) विदेशी लेखक अपने वर्णन को चटपटा बनाने के लिये घटनाओं, नगरों तथा गाँवों का रोचक चित्र तो प्रस्तुत करते हैं किंतु उनकी पृष्ठभूमि को समझाने में असफल रहते हैं।

Leave a Comment